सर्द रातों कि ख़ामोशी में
रात के दूसरे -तीसरे पहर
सर्द बिस्तर की चादर पे
एक दूसरे से लिपट
रिश्ते कि गर्माहट
ढूंढते हुऐ ज़िस्म।
कभी उलझे रिश्तों को
सुलझाने कि कश्म कश में
गर्म लिहाफ में ,
दम तोड़ते ज़िस्म।
कभी जिंदगी का ताना बाना बुनते
गर्म अलाव के पास
क्या खोया , क्या पाया
सिर धुनते ज़िस्म।
कभी मय के प्याले में
खुशियां ढ़ूढ़ते ,कह- कहे
खोखली हंसी हँसते ,मुखोटे चढ़ाए
थके थके से ज़िस्म।
कल मौसम बदल जाएगा।

सर्द बिस्तर की चादर पे
एक दूसरे से लिपट
रिश्ते कि गर्माहट
ढूंढते हुऐ ज़िस्म।
कभी उलझे रिश्तों को
सुलझाने कि कश्म कश में
गर्म लिहाफ में ,
दम तोड़ते ज़िस्म।
कभी जिंदगी का ताना बाना बुनते
गर्म अलाव के पास
क्या खोया , क्या पाया
सिर धुनते ज़िस्म।
कभी मय के प्याले में
खुशियां ढ़ूढ़ते ,कह- कहे
खोखली हंसी हँसते ,मुखोटे चढ़ाए
थके थके से ज़िस्म।
कल मौसम बदल जाएगा।