Tuesday, January 14, 2014

यांदों कि संदूकड़ी

मेरी यांदों कि संदूकड़ी में कुछ  और पल संजो  के रखे  मैंने। … आज खोला तो कुछ पन्ने सामने खुल गए उस  से जुड़े हुऐ। उम्र  के उस मोड़ पे जब नए ख्वाब नही देखे जाते। ।एक दिन अचानक एक मैसेज मिला मेल पे.…। उत्तर नहीं दिया तो फिर से वही मेसज। जाने क्या था उन शब्दों में। … और फिर एक अनजाने नंबर से फ़ोन आया। और वो नंबर जाना पहचाना हो गया। । वो आवाज़ जानी पहचानी हो गयी। कुछ था हमारे बीच एक आकर्षण। … 

एक दिन उसने कहा    मिलोगी मुझसे ? और मैंने कहा क्यों नहीं !!!!! 

जाने कितनी बार खुद को आईने में देखा। शायद कई सालों से खुद को इस तरह नहीं देखा था। ओह कितनी कमियां नज़र आयीं खुद मैं  . नियत वक़्त पे मैं धड़कते दिल के साथ एअरपोर्ट पंहुची। न उसने मुझे देखा था न मैंने उसे  …फोन की घंटी के साथ मेरे दिल कि धड़कन बढ़ गयी और हम दोनों आमने सामने। खुद को काबू किया   ज़ाने क्यों एक अंजना सा डर मुझे घेरने लगा। किसी तरह काबू किया किया खुद पे , खुद के डर  पे और हम अनजान से पहचाने हो गए। एक कहानी कि शुरुआत हो गयी  .और वो पल मेरी संदूकड़ी में  

मौसम बदलते रहे और एक दिन,.   फिर वही सवाल ,  मिलोगी मुझसे ? क्यों नहीं जबाब मेरा  !!!

हम एक दूसरे  के सामने। कितनी बातें कुछ कही कुछ अनकही ,कुछ सुनी कुछ अनसुनी  ,कुछ समझा फिर भी बहुत कुछ रह गया समझने को ,बहुत कुछ जाना फिर भी बहुत कुछ रह गया जान  ने को  . हम थे और हमारे बीच वाइन के ग्लास और कुछ स्नैक्स। …वाइन ने कुछ कुछ पिघलाना शुरू किया जमी हुई चुप्पी को  !  और वक़्त एक और कहानी लिख गया। …ओर मेरी संदूकड़ी में सहेज़ के रखी मेरी यादों कि जमा पूँजी में  एक और पल जुड़ गया । 

वक़्त गुज़रता रहा।   अपने अपने हिस्से का सफ़र हम तय करते रहे. जाने उसके हिस्से मैं क्या था मुझे नहीं मालूम। … मेरे हिस्से का उसे नहीं मालूम। ।कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं। . 

मिलोगी मुझसे ? उसने पूछा मुझसे और मैंने उसी लहज़े मैं कहा क्यों नहीं ??? 

और फिर मैंने उस सर्द रात मैं उस से मिलने का मन बनाया ,,,सर्दियों कि वो सुन सान रात और हम और हमारे बीच बहुत कुछ अनकहा। उसकी बाहों के घेरे मैं पिघलती मैं। मेज पे रखे दो गिलास और व्हिस्की कि बोतल, कुछ नमकीन    ……। दूर कुछ खिड़कियों से छन छन के आती रौशनी। ....... आसमान पे बादलों से खिलवाड़ करता चाँद। ।चारों  ओर फैला सन्नाटा   !! उसकी गर्म साँसों कि आवाज़ और मेरे दिल कि धड़कने कि आवाज़। .... और वक़्त ने एक और पन्ना रंग दिया मेरी यादों का। । 

मेरा इंतज़ार करता वो अकेले रेस्त्रा में.………… उसके सामने रखा व्हिस्की का गिलास सब कुछ कितना रूमानी लग रहा था। । मैं रात को अकेले उस से मिलने जा रही थी। …उसके साथ वक़्त से कुछ रंगीन रूमानी पल छीन लेना चाहती  थी। वो मेरा नहीं ,मैं उसकी नहीं, कोई करार नहीं। कोई वादा भी नही.……मैं बोलती जा रही थी और वो मुझे सुनता जा रहा था, मेरी सारी  दुनिया जैसे सिमट के उस में समां गयी  … उसकी नज़र का तिलिस्सम  मुझे बाँध गया।  वो पल मेरे दिल पे एक कहानी लिख गया। …मेरी यादों कि संदूकड़ी में मैंने उसे भी सहेज के रख दिया। । 

इंतज़ार कुछ और यादों का !!!!

Tuesday, December 18, 2012

दुनिया हादसों पे शर्मशार
और मैं  !
खुद के होने पे !!
कब तक  ?
ऐ पुरुष , आखिर कब तक ???
 करता रहेगा मेरे स्त्रीत्व का अपमान ?????
कब तक नोचेगा  मुझे ?
तार तार करता रहेगा दामन मेरा
आखिर कब तक ?????

Friday, November 30, 2012

टूटा हुआ लम्हा

वक्त की शाख से टूटा हुआ एक लम्हा ,
यूँ आके  मिला , आज  मुझसे !


कॉफ़ी की खुशबू से महकते कॉफ़ी घर की  ,
खिड़की से लगी मेज पे  रखे प्याले से ,
उठते धुऐं और खुशबू की तरह 
यूँ आके आज मिला मुझसे ...

मयखाने के गिलासों से उठती गंध ,
मुहँ मे फैली कडुवाहट ,
गले से उतरती गर्माहट की तरह ,
यूँ आके मिला आज मुझसे !!!

सर्दियों की ठिठुरती शाम ,
सिगड़ियों से निकलते धुऐं ,
और उस पे  सिकती गर्म रोटियों की
 खुशबू की तरह
यूँ आके आज मिला मुझसे !!!

वक्त की शाख से टूटा एक लम्हा ...
यूँ आके आज मिला मुझसे !!!!1

Saturday, September 22, 2012

कुछ सवाल नागफनी के काँटों की तरह उगते ही रहते हैं .....अगर वो सवाल नहीं होते तो शायद जिन्दगी आसान होती या मुश्किल पता नहीं .... एक सवाल का जबाब मिलता नहीं पूरी तरह तो दूसरा मुहं खोले तैयार .....सुलझाने लगती हूँ तो और उलझ जाती हूँ ...

जीने की कला ......रोकर जिन्दगी गुजारने  मै  नहीं ...बेचारगी मैं तो नहीं ...जिन्दगी को घसीटने मैं भी नहीं ....\

इंसान हो या परिस्तिथी  ,जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार करो ! जिन्दगी थोड़ी आसान हो जाएगी ....इस पर भी कई सवाल उठ खड़े हुए ...

सबसे बड़ा अहम् सवाल , मै कौन हूँ ????? कितने ही उत्तर दे दिए खुद को परन्तु फिर भी लगा मैं  तो नहीं ...ये तो सिर्फ मेरी पहचान भर है ....मैं तो नहीं ...

जहाँ से शुरू हुई थी वही पे जाके ख़तम हो गयी मेरी खोज आधी अधूरी .....


Wednesday, August 1, 2012

जियें सभी बहनों के भाई

जियें सभी बहनों के भाई  !!! कही भी रहें ...दूर और पास कोई मायने नहीं रहता.....बस वो सलामत रहें !!!! राखी का त्यौहार करीब आ रहा है , चारों तरफ राखियाँ ही राखियाँ .....दुकाने सजी हैं रंग  बिरंगी राखियों से ...बड़ी , छोटी , रेशम के धागों से.....

मै चाहती हूँ की मैं इस त्यौहार को निर्विकार  हो कर देखूं पर चाहने से भी ऐसा कर नहीं पाती जाने क्यों विचलित हो ही जाती हूँ ....न भीगने वाली इन आँखों में बरबस  पानी आ ही जाता है ! जो खो गया ,जो बिछुड़  गया हमेशा के लिए उसकी याद में ....

जब वो था तो, मिलूं  या न मिलूं पर उसके लिए दिल से दुआ करती थी , उसकी लम्बी उम्र ,उसकी खुशहाल जिन्दगी के लिए.....बस एक सादी सी राखी का धागा  बहुत  लगता था मुझे .....जिसमें  लपेट के मैं अपनी सारी शुभ-कामनाए उसे भेज देती थी और ख़ुशी ख़ुशी  ये त्यौहार बच्चों  के साथ बीत जाता था .   

मेरी बेटी नहीं पर घर पर फिर भी रौनक बनी रहती थी . अपने भाइयों को राखी बांधने उनकी मैंने  मौसी और बुआ की बेटियां आती और उनसे पूजा का सामान लगवाती ,दिया जलाकर भाईयों  को राखी बंधवा , मुझे   लगता मैंने  मेरे एकलौते छोटे भाई को अपना आशीर्वाद दे दिया ..

पर आज जब वो इस दुनिया में  नहीं रहा तो ..उसकी कमी का अहसास बना रहता है .कोई भाइयों से जुड़ी  बातें करें तो मेरी आँखें भर आती हैं ...दूर ही सही पर था तो ......किसी अपने को  खोना कितना दुखदायी होता....जो खो दे वही महसूस करता है !

कल राखी है और मैं  दिल से  सभी बहनों के भाइयों को दुआ देती हूँ वो सलामत रहें ... खुश रहें !!!!!!

Sunday, July 29, 2012

इश्क है इबादत



ये इश्क है या इबादत ? 
ये तो खुदा ही जाने  !
      या  रब्ब !!!                                               
मुझे माफ़ करना !
मेरा मीत ..... 
 मेरे रग -रग मै समाता है 
मेरी कल्पनाओ मै ...
उसका !
अक्स उभेर आता है  ..

 उसके  होने से 
पूरी हो जाती है हर कमी .....
अपने अधूरेपन का अहसास ही नहीं रहता  !
इश्क इबादत का दूसरा रूप है ,
तुझको पाने की राह है..!
तेरे सजदे मै झुकता है सिर  मेरा 
तुझसे मांगती हूँ ...
मै इश्क मेरा .....................

रब्बा मेरे !!!!!
मुझे राह दिखा ....
रूहानी मुहब्बत करा  
जहाँ  पाने की ...
.ना ...
चाह हो ,
खुद को मिटाने की राह हो ! 
इश्क मै ही तुझे पानां है 
तेरी इबादत मै सिर झुकाना है .........................

Saturday, July 28, 2012

बरसात का एक दिन

रात कुछ बादल गरजे और फिर लगा बादलों ने आज बरस कर जल और थल एक कर देना है ... सुबह भोर की किरण के साथ देखा  की मेरे घर के आस पास तो सूखा ही पड़ा है ....हवा का मिजाज़ बता रहा  था की कही तो ये बादल बरसे है ...कहीं तो प्यासी धरती की प्यास बुझी है .आसमाँ बादलों से अब भी भरा हुआ था ..मौसम उमस भरा बस कभी कभी हवा का झोंका आता और और बारिश हुई है कहीं इस का अहसास करा जाता ..उम्मीद से बाहर देखती हूँ की जल्दी ही ये बादल आसमाँ का सीना चीर धरती को अपनी अमृत वर्षा  से भिगो देंगें और फिर धरती तृप्त हो नये जीवन के अंकुर से अंकुरित हो नये रूप मे अवतरित होऐगी...
जाने बाहर देखते हुई मुझे लगा मै ही नहीं प्रकृति भी उन अमृत की बूंदों का बेसब्री से ही इंतज़ार कर रही हैं .... लगा जैसे सब चातक की तरह आसमाँ की तरफ टक टकी  लगाये बैठे हैं प्रतीक्षा में .....चारों और एक उदासी सी छाई हुई है ..एक अजीब तरह की बैचैनी ..

दोपहर का वक़्त ....अचानक जोर जोर से बादल गरजने लगे ...बिजली की  कौंध ...लगा दो दैत्य आपस मे युध्ह कर रहें हो ....ओह्ह्ह्ह आज तो बस बरस ही जायेगा ये बादल जो कब से बरसने के इंतज़ार मे बैठा है ...इतना गर्जन कि धरती ही हिल जाये ....बाहर ये तांडव चल रहा और.मैं   !!!!  ये सब देखती रही एक निर्विकार  भाव लिए  ..कभी आसमाँ पे छायें बादलों को देखती कभी बाहर यूकिलिप्टस के वृक्षों को जो बस बिना हिले डुले इंतज़ार कर रहें है उन जीवनदायनी बूदों का ....

अचानक सोंधी सोंधी मिटटी कि खुशबू पूरे सबाब के साथ उठने लगी ...मैंने उठकर देखा तो बड़ी बड़ी बूंदे धरती के आगोश में  समाने  लगी ....और धरती ने ....  इस मिलन के आनंद में  सोंधी सोंधी खुशबू बिखेर दी ...
बूँदें बरसती रहीं कभी जोर से और कभी धीरे धीरे .. मैं खिड़की पे खड़ी खड़ी बारिश का ये मन को  मोहने वाला नज़ारा देखती रही..... कभी कुछ भी साफ़ नहीं दिखाई देता सिर्फ बारिश कि बूंदे ही बूँदें और धरती पे बिखरा पानी ही पानी ....सड़क अब निखरी निखरी लगने लगी ....आने जाने वाले    कुछ वाहन , मेरे और प्रकृति के इस मौन को  तोड़ देती कुछ पलों के लिए, पर फिर से हम दोनों के बीच एक रिश्ता कायम हो जाता ! सड़क के किनारे किनारे बहुत से वृक्ष हैं जो अब तक एक  भिखारिन की तरह , बेजान, मलिन से लग रहे थे अब किसी नव योवना कि तरह मदहोशी के आलम में  थे .....हर एक एक पत्ता नहाया हुआ है उस अमृत रस .... जैसे नवयोवना का एक एक अंग  भीगा  हुआ हो प्रेमरस  में    ...और मैं  !!!  उन दरख्तों का हुस्न देख देख निहाल होती रही ...
  
अब धीरे धीरे वर्षा का वेग कुछ कम हुआ .... मिलन कि वो तीव्र इच्छा...  लगा जैसे भूखे  कि भूख !!!  अब धीरे -धीरे शांत होने लगी हो .......फिर  हल्की हलकी फुहारें पड़ने लगीं और मैं  खिड़की के पास बैठे बैठे उस आलम का मज़ा चाय की चुस्कियों के साथ लेने  लगी .....धीरे धीरे बारिश बंद हो गयी और मैं   बारिश कि बूंदों  को  निहारती रही ..... छत से गिरती बूंदे ,   वृक्षों की शाखों से गिरती बूँदें , फूलों की पंखुड़ियों पे अटकी  बूँदें ....जीवनदायनी बूँदें !!!!!!


पेड़ों की शाखों पे अटकी बारिश की बूँदें ,
 इंसान के जीवन की कहानी कहती बूँदें !
 इन बूंदों मे दिखते सतरंगी सपने ,
इन सपनों को महकाती शबनम की बूंदे !!!