Friday, April 22, 2011

ख़ामोशी

जाने कौन था वो ? जाने किसने दी सदा ? ...
दूर -दूर तक ख़ामोशी  बिखरी पड़ी थी .....
शायद .......मैं ही थी.....!  वो !!
खुद को आवाज़ दे .... ख़ामोशी तोड़ रही थी ...
ख़ामोशी की  एक जबान होती है !
हर सन्नाटा कुछ शोर करता है !
सुना करते थे हम
 आज महसूस करते है ....
बाहर बहुत शोर है
अन्दर ख़ामोशी पसरी पड़ी है
खिड़की से झांकता चाँद...
न जाने कितनी बाते करता है मुझसे ....
 हर लहर कहानी सुना जाती है मुझको
छत की मुंडेर पे बैठे परिंदे
अभिवादन करते है मेरा ..
मुझसे सुबह का सूरज अलसाया सा मिलता है
मंद मंद  चलने वाली बयार ..
प्रियतम की तरह मिलती है मुझसे ...
फिर भी ख़ामोशी ......
 तपती जेठ  की दुपहरी सी खामोश ..





Tuesday, March 8, 2011


कुछ तारों की बारात   चली है 
चाँद अकेला ......

बादलों के  झुरमुट के साथ 
खिलवाड़ करता हुआ .......
 खुले आसमान के नीचे ...
 मैंने ज़िंदगी के नाम .
एक जाम उठाया ...!

धीरे- धीरे रात सरक रही है ..
 न जाने कितने वाकयात  लिए ...
 न जाने कितने पल ..

और  मैं !!!

 जिन्दंगी को लपेटती रही ...
सामने  रखी शमा जलती रही 
 वो सामने बैठा, कुछ कहता रहा ....
मैं  सामने बैठी, कुछ सुनती रही .....

आज कोई कड़वाहट 
छू के नहीं गयी ...
शायद !
 जाम के साथ वो भी पी गयी 

मद्धम चांदनी मे भीगे हम दोनों 
 साथ बिताये पच्चीस सालों के नाम 
एक दूसरे का शुक्रिया अदा करते रहे .
आने वाले वर्षों मे ,
साथ रहने का सपना बुनते रहे 

जाने क्यों आज ...?  
फिर से उसने ....
मुझे क्यों चुन लिया ?

नदी के किनारे की तरह 
हम साथ-साथ  चलते रहे .
ज़िक्र था कई साल का ..
पानियों की तरह बहते रहे ..

 आज ,  कोई शिकवा नहीं रहा .
मुझे ज़िंदगी से  !
आज कोई गिला नहीं  रहा ...

रात तारों की बारात लिए .
फूलों की सौगात लिए 
अपने प्रियतम से मिलने चली 
कुछ तारों की बारात चली ....

Monday, February 7, 2011

स्वागतहै ऋतुराज का !!!

कल बसंत पंचमी है .... गतिशीलता ,सरलता और नवजीवन  का पर्याय है बसंत !  बसंत का अर्थ है बहार  का मौसम....शिशिर (पतझर ) के बाद नवीनता और  जीवन की दस्तक लिए चला आता है बसंत !..धरती पीले रंग की ओढनी ओढ़ ..... रंग बिरंगी साड़ी पहन  ..... सोलह श्रींगार कर .....जीवन के लय पे थिरकती हुई सी दिखती है ......चारों और नव कोंपलें  अपना सिर बाहर निकाल मानो  अपने होने का अहसास कराती  है...... वो लाल -लाल अंगारों से दहकते टेसू के फूल , सेमल के फूल ...बिना पत्तों वाली शाखों  पे ...कुछ   धरती पे बिखरे .... आड़ू के गुलाबी से फूल , खुबानी और चेरी  के दुधिया फूल ...इनसे सजे बाग़ बगीचे, रास्ते..... पीले - पीले सरसों के फूलों से सजे खेत खलिहान ....वो  मंद -मंद बहती हुई   बसंती बयार  ......

जब हम बच्चे थे तो बसंत पंचमी  के दिन पीले रंग के वस्त्र  पहने जाते थे ... कुछ रुमाल , कुछ टोपियाँ  पीले रंग मे रंग दी जाती थी और बच्चों को पहना दी जाती थी ...बच्चो का मुंडन करना हो या विवाह के बंधन मे बंधना हो .. बसंत पंचमी का दिन !
पीला रंग चैतन्य का सूचक है ....जीवन को उल्लास , मादकता , तरुनाई , नवीनता के साथ जीना ही बसंती रंग मे रंगना है ......बसंत ऋतू को ऋतू राज भी कहा जाता है .. जीवन के सब रंगों मे से उल्लास , हर्ष का मौसम लेके चला आता है बसंत !!!! मिलन की मधुरिमा ... रंगों से भरा फाग  ले के चला आता है बसंत !! दिल खोल इसका स्वागत करे .....आओ ऋतू राज  !         आपका स्वागत है !!!!!     

Saturday, February 5, 2011

धुंध ही .............धुंध !
चारों तरफ़ फैली ये धुंध ...!!
 जिस तरफ़ भी नज़र दौराऊँ
हर तरफ़ धुंध ही धुंध !!!!

कितनी समानता है 
मेरे आज ..और इसमे  !
मेरे जीवन मे भी....
 फैली हुई है धुंध ही धुंध !!!!!  

जाना है मुझको जिस राह
वो नज़र आती नहीं ....
खरी हूँ चौराहे पे  !
जाना है किस राह ...?????
समझ पाती नहीं !!!!!!

जानती हूँ इतना  .....
 उस पार .....
 प्रियतम है मेरा !

एक आस है .. विश्वाश है ...
ये धुंध !!!!....कभी तो हटेगी 
सूरज की रौशनी मे.....
मैं  नहाई...!  प्रियतम से मिलूंगी ....

एक छोटी सी खवाहिश है मेरी ...
जब प्रियतम से ....
मिलन हो मेरा ...
 तू फिर से छा  जाना ....
ताकि .....
कोई देख न सके ...
उस मिलन को ...!!!

Friday, December 24, 2010

कुछ दिनों से मै समुन्दर के साथ हूँ.... दूर - दूर तक सिर्फ पानी ही पानी .... बीते  , दिन से ही वो गुस्से मै है .... उसके कई रूप देखे है मैंने इन दिनों .... रात भर मै उसकी गुस्से भरी आवाज़ सुनती रही .... अभी भी वो गुस्साया हुआ है .... न जाने क्यों ???????     दूर दूर तक लहरों का जमघट है .... जो वापिस जाती है लहरे,.... किनारे से टकरा के.... ,चंद फ़ासले पे इंतज़ार करती दूसरी लहरों से मिल फिर से वापिस आती है ,पूरे वेग  के साथ .... लगता है आज किनारे का दंभ चूर -चूर करके ही दम लेंगी ..... .....

कुछ दिनों पहले,  इन्ही लहरों को प्यार से अठ्खैलियाँ करते देखा था ...किनारे  के साथ .... लगता था जैसे अपने प्रियतम  ! को रिझा रही थी ... प्रियतम को अपने पास आने का निमंत्रण दे रही थी ...... समुन्दर का रंग साफ़ था .. सूरज  की किरणे भी लहरों के साथ खिलवाड़ कर रही थी .... मंद ,मंद बयार चल रही थी ......

लगता है किनारे का अहम् ..... समुन्दर को आहत कर गया .... सारा का सारा मौसम बदल गया .... समुन्दर का नीला रंग अब कुछ काला सा दिखने लगा है .. उसके   गुस्से  से डर ... सूरज भी बादलों के आँचल मै छुप गया ...हवा भी ..... सहम के तेज़ चलने लगी .. अचानक !... सब कुछ पल मै , बदल गया ......

ये शहर !..... अपनी ही धुन मै है ... chirstmas है आज .... सब अपने मै ही व्यस्त है .. किसको फुर्सत है की वो समुन्दर की आवाज़ सुने .....उसका दर्द महसूस करे ......

 और  मै ??? 
  

Wednesday, December 22, 2010

रात न जाने क्या हुआ ... मै कुछ पलों मै सारी बीती जिंदगी जी गयी ... खाव्ब थे या गुजर चुकी कहानी ..पात्र वही थे सिर्फ रंगशाला अलग थी ... सालो पुराने देखे खाव्ब का ...जो पूरा नहीं हुआ ... आज उसका अंतिम संस्कार था शायद ...कुछ और खाव्ब जो देखे थे मैंने .. सोचा था शायद मेरे जीवन मै पूर्णता ... पर आज भी नदी के इस पार हूँ .. रात उनसे भी मिली ... पात्र वही थे बस मौसम अलग था ...कुछ सवालो के जबाब देती रही रात भर ... शायद  खुद को मुक्त करती रही अनचाहे बन्धनों से ..आत्मा पे कही कुछ बोझ था ..शायद वो खाव्ब बन आया था ..... पन्ने पलटते रहे रात भर ... मौसम बदलते रहे ...सुर बदलते रहे ..बस एक मै ही नहीं बदली ....
आँख खुली तो ...सोचने लगी ये सब क्या था ? सोचने का वही क्रम फिर चल पड़ा ....... सोचा मै ही बदल जाऊं शायद सब बदल जायेगा  ..... और अब खुद को बदलने का मौसम आ गया  शायद !   

Tuesday, December 21, 2010

चाँद और मै

रात चाँद तो वही था.......
बस जमीन अपनी नहीं थी
सोच अपनी थी ...
 पर बिस्तर अपना नहीं था .

जी किया चाँद को आगोश मै भर लूं
शायद ............
बादलों  का आना जाना ,
रिमझिम फुहारों का बरसना ....
सब कुछ तो वही था
बस आसमान अपना नहीं था !
जी किया फुहारों को मुट्ठी मै भर लूं.......
शायद ........

रात चाँद तो वही था
बस .............